बहुत दिन हुए कुछ लिखा जाए, फिर सोचा कुछ देर रुका जाए ,


बहुत दिन हुए कुछ लिखा जाए,
फिर सोचा कुछ देर रुका जाए ,

ख्वाहिशो को आसमान दिया जाए ,
उलझनों को विराम दिया जाए
कलम भी मुरझाई सी है
सोचा उसे विचारों की स्याही दी जाए

वक्त बदलते देर नहीं लगती ,
तो सोचा क्यों ना कुछ देर विचारों को रोका जाये,

बहुत दिन हुए कुछ लिखा जाए,
फिर सोचा कुछ देर रुका जाए ,

मंजिले बहुत सी है ,
रास्ते भी है कई ,
दिल में झांक कर अपने ,
मंजिलो को फिर से समझा जाए
Chirag ki kalam

इंतेजार की भी एक सीमा होती है ,
ख़त्म उसे भी किया जाए ,

नये  घर में जाने से पहले
पुराने मकान को फिर से देखा जाए

बहुत दिन हुए कुछ लिखा जाए,
फिर सोचा कुछ देर रुका जाए ,

दिल में रंजिशे भी है ,
आजाद पंछियो की तरह,
उन्हें भी दिल से विदा किया जाए ,

नयी खुशियों के लिए चलो ,
कुछ जगह की जाए
रुककर एक जगह सिर्फ बैठा ना जाए,
कमियों को अपनी ढूंढ  कर ,

दुरुस्त उन्हें किया जाए
बहुत दिन हुए कुछ लिखा जाए,
फिर सोचा कुछ देर रुका जाए ,

-चिराग जोशी

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