Sunday, 25 March 2018

Indori Poha Recipe | तिरभिन्नाट पोहा-सख्त लौंडा



Indori Poha Receipe in My Style


 
रितिक – “ भिया राम , और का थे इत्ते दिन से दिख नी रिये थे “ । पप्पू भिया- “ अरे रितिक यार क्या बताउ अपन यार दिल्ली चले गे थे “। रितिक- “ भिया वा क्या करने गे थे “। इतने मे उमेश का आना हुआ –“ भियाओ...जय श्री महाकाल , और कई अतरा दिन थे का था तम दिखिया कोणी ?मने तमारे भोत ढूंढ्यो दादा ?तम मानोगा नी महाकाल मंदिर के बाहर मने रोज़ चक्कर काट्या ने अणी चक्करा मे जूता भी पडी गिया “। पप्पू भिया-  “ अबे गेलिये तू म्हारे महाकाल मंदिर के बाहर काय वास्ते ढूंढी रियो थो “। रितिक- “अरे भिया वो तुम कांड कर गये थे नी इंदौर मे ,राजबाडा परवो एक ने जब जीरावन कम डाला पोहे मे तो तुमने उसको भोत मारा था ।



फिर वो टी.आई तुमको कब से ढूंढ रे थे नी ।“ उमेश- “ हा भिया अणी वास्ते म्हारे लागियो के तम जो है नी कबार वी भिखारी बैठे नी महाकाल के बाहर वा बैठिया होयगा ने तमारे देखवा के चक्कर मे मणे कई एक भिखारी को कटोरो छिन लियो ने फिर जो म्हारी धुलाई की नी भिया कई बताओ तम्हारे । म्हारे तो लाग्यो के ई सब पुलिस वाला ओन के कोई मिल्यो कोणी मारवा वास्ते तब हीच म्हारे उडाई दियो “। ये सब सुनने के बाद पप्पू भिया का दिमाग गरमा गिया ने उनने दोई छोरा ओन के लगाये थप्प्ड ,दे थप्प्ड ,दे थप्प्ड । पप्पू भिया- “ अरे तुम दोनो भी है नी भाग मत खाया करो सुबह सुबह । अपन तो क्या है छोटे दिल्ली इसलिये गये के यार यहा क्या वो पिछ्ली  फरवरी मे कई अपने को नी-नी करके 1000 तो प्रोप्रोज़ आये “। रितिक-“भिया प्रोप्रोज नी यार प्रप्रोज होता है “।



पप्पू भिया-“हा रे वहीच
,तो क्या छोटे तेरे को याद है नी – नी करके 200-300 का जवाब तो लिखा अपन ने पर अब सबको थोडे ना लिख सकते है । फिर अपन क्या यार नरम दिल इंसान है । इसिलिये अपन जो है जाकिर भाई के पास गये थे “।





उमेश- “ दादा ,जाकिर ऊ तबलो बजावे ऊ दादा “। पप्पू भिया – “ नी रे ऊ नी यार , यो है नी अपने मालवा ,ने अपने इंदौर का लौंडा है “। रितिक- “ तो भिया के कोई बाबा वगेरह है क्या” । पप्पू  भिया –“ नी यार वो नी रे , ये क्या छोटे सख्त लौंडा है “। उमेश- “सख्त भिया मने था बनिया है कई ई दादा “। पप्पू भिया – “ अबे गेलिये ,ये भिया जो है नी छोरियो के सामने पिघलते नी है भिया ने इसकी ट्रेनिंग देते है वा दिल्ली मे “।



रितिक-“ वा भिया ,तुम तो गजब निकले तो मतलब अब शादी नी करोगे तुम , चलो बढिया अब तुम वो जिसको रोज़ टावर पर मद्रासी डोसा खिलाते थे उसको अपन घुमा ले आज “। पप्पू भिया- “ अबे तू खायेगा रे , सख्त लौंडा मने के अब जो है अपने को रिझाना आसान नी है “। उमेश- “ चलो भिया शाम को देखांगा मेला मे चलांगा ने करांगा त्म्हारा टेस्ट ने पतो लग जायेगो के तम पिघलोगा के नी “। पप्पू भिया- “ हओ रे देख लेना” ।

 

शाम को तीनो मेले मे पहुचते है । रितिक- “ भिया उधर देखो ये तो वही है नी जिसे तुमने रामघाट पर प्रपोज किया था ने फिर इसके भाईयो ने तुमको नृसिह घाट पर धोया था “। पप्पू  भिया –“  हओ रे अपने को कई फर्क नी पडता यार ,ऐसी भोत आती है और फिर अपन ने तो क्या प्यार के चक्कर मे मार खाली ने फिर उस दिन रक्षाबंधन भी था । कई अपन मार देते तो वो अपने को राखी बांध देती ना “। उमेश- “पप्पू भिया,वो देखो कतरो बडो झूलो “।




पप्पू भिया – “ हा दिख रिया है रे गेलिये” । उमेश- “ पप्पू भिया ,तम है नी अणे झुला थे भी बडी-बडी फेको” । पप्पू भिया ने फिर लगाये दो थप्पड उमेश को । रितिक-  “उमेश यार एक काम करते है फोटू खिचवाते है मेले मे “। तीनो फोटो स्टूडियो पहुचे वहा उमेश और रितिक दोनो अलग अलग हिरोइन के पूतले के साथ फोटो खिचवा रहे थे । उमेश-“भिया आओ नी तम भी खिचवा लो एक आध फोटू “। रितिक-“अबे उमेश पप्पू भिया सख्त लौंडे है वो नी पिघलेंगे “। तभी उमेश की नज़र ऐश्वर्या के पुतले पर पडी और वो झट से उसे ले आया और फोटो खिचने के लिये केने लगा । पप्पू भिया ये सब देख रे थे कुछ देर तो रुके ने फिर जाकर उन दोनो से बोले –“ देखो रे लौंडो वैसे तो अपन है तो सख्त लौंडे पर या अपण पिघली गिया यार । चलो तम साईड मे वी जाओ ने अपन को फोटो खिचवा ने दो ऐशवर्या जी के साथ “।

 
उमेश और रितिक पप्पू भिया को देखकर मन ही मन हस रहे थे ।

 

Indori Poha Recipe

 
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तिरभिन्नाट पोहा-पप्पू भिया का रिजाईन


 

तिरभिन्नाट पोहा-इसके बिना जिंदगी खत्म भिया


 

तिरभिन्नाट पोहा-पप्पू भिया का लैपटाप







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Thursday, 15 March 2018

Hindi Poetry | खामखा ही निकल जाता हूं


खामखा ही निकल जाता हूं,


खामखा ही निकल गया था,


भीड़ में अपनी पहचान बनाने ,


चंद कागज़ के टुकड़े जेबो में भरने।





लड़ाई मेरी खुद से ही थी,

दुसरो को कुछ दिखाने,

अपनो से दूर आ गया हूं

खामखा ही निकल जाता हूं,

खामखा ही निकल गया था,

Hindi Poetry


मुश्किलें मेरी अपनी थी,

सवाल भी मेरे थे,

आज कुछ दूर आकर घर से,

वही रोटी फिर खा रहा हूं

जीतने की चाहत भी थी,

हारने से घबरा रहा था,

चार कदम निकल कर शहर से,

जीत कर फिर आज हार गया हूं

खामखा ही निकल जाता हूं,

खामखा ही निकल गया था,

आभासी इस दुनिया के,

चोचलों को सच मान रहा हूं,

गाव की उस मिटटी को

आज फिर कोस रहा हूं


उड़ने की आजादी तो अब मिली है,


जंजीर से बंधे मेरे पैरो को



देखकर ही इतरा रहा हूं,

खामखा ही निकल जाता हूं,

खामखा ही निकल गया था,

वीकेंड और सैलेरी क्रेडिट

के मैसेज के इंतेजार में ही,

हफ्ते दर हफ्ते ,महीने दर महीने ,

साल गुज़ार रहा हूं।




जिस टिफिन को स्कूल में खाते वक्त बड़े सपने देखता था,

आज उसी टिफिन को महीने में कभी कभी खा रहा हूं ।

खामखा ही निकल जाता हूं,

खामखा ही निकल गया था,

मुस्कराहट जो एक वक्त पर,

बीना कारण आ जाय करती थी,

आज उसे ढूंढने के लिए,

यू ट्यूब पर aib और clc के वीडियो देखें जा रहा हूं ।

जिंदगी की एक सच्चाई है,

के पैसो से ख़ुशी नही मिलती

मैं बस उसी सच्चाई को दरकिनार करके,

रोज़ अँधेरे में निकल कर अँधेरे में वापस आ रहा हूं।

खामखा ही निकल जाता हूं,

खामखा ही निकल गया था,




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