Thursday, 6 December 2018

India Tour Of Australia 2018

 India Tour of Australia 2018 First Test at Adelaide from 6-10 December 2018.



 

हर खेल मे जितने महत्वपूर्ण  खिलाडी  होते है उतने ही जरुरी उन्हे मैदान और उसके बाहर स्पोर्ट करने वाले दर्शक होते है । खिलाडी फिल्ड पर खेल खेलता है और वही खेल हर दर्शक के दिमाग मे भी चलता रहता है ।  कमेंटटॅर कह्ते है “  ohh it’s a loose ball outside the offstump” तो दर्शक अपने ही तरह से बात कहते है -  “अरे यार देख के तो डाल भाई” , “  मैंने तो पहले ही कहा था इसे मत रखो “ । 



इसके साथ ही जब जरुरत  होती तो टीम के साथ खडे होने की तो घर पर बैठे हुये ही कहते है- “  चलो- चलो  लडको  आराम से जीत रहे है ,सिंगल्स लेते रहो “ । मैं भी उन्ही दर्शको मे से एक हू, क्रिकेट का बहुत  बडा पंखा और टीम इंडिया का सबसे बडा सर्मथक ।  वैसे मैं टीम का आलोचक  भी हू और मेरा मानना है के जब आप  किसी का साथ दे तो उसकी आलोचना भी करे ताकी वो ये जान पाये के वो कहा गलत है ।



दोस्त का दोस्त अपना दोस्त और दोस्त का दुश्मन अपना दुश्मन



ये बात हमने फिल्मो मे काफी सुनी है । फिर इसे मैंने क्रिकेट मे अपना लिया , जब से क्रिकेट देखा तो कुछ याद रहा या ना रहा पर एक बात जरुर याद रही के पाकिस्तान से हार बर्दाश्त नही होगी । चाहे वो 96 वर्ल्ड कप का QUARTER FINAL हो या सहारा कप या फिर अनिल भाई के दिल्ली के टेस्ट मैच के 10 विकेट ।  हर बार टीम इंडिया  की इन जीत मे मैंने वैसा ही रिएक्ट किया जैसे बस ये लम्हा यही थम जाये और जिंदगी भर इन मैचेस की Highlights टीवी पर आती रहे । उस वक्त मोबाईल तो था नही पर अब मैं कई बार इन मैचेस हो  YouTube पर देखता रहता हू।  



हाल तो ये रह्ता था के हम दोस्त स्कूल या गली मे जब भी मिलते  एक बार Henry Olonga  की तारीफ कर लेते पर पाकिस्तान के किसी प्लेयर की तारीफ नही करते फिर चाहे वो Saeed Anwar ही क्यो ना हो ।  फिर रही सही कसर जेपी. दत्ता की  फिल्म Border ने कर दी ।



कारगिल युद्ध  के बाद स्कूल मे एक वाद-विवाद प्रतियोगिता हुई और मैंने उसमे जो बाते की वो मैं ऐसे कर रहा था जैसे सामने पाकिस्तानी सेना के टैंक हो और मैं Border का सनी देओल ।



फिर आया 2003



क्रिकेट  मे 2003 को कोई याद रखे ना पर मेरे पास इस साल की बहुत यादे है । सचिन का शोएब को मारा अपर कट, नेहराजी के छ: विकेट और फाईनल मे जहीर खान की वो वाईड गेंद । हर वर्ल्ड- कप की तरह इसमे भी हमने पाकिस्तान को हराया था ।  पूरा भारत ये मानता था के चाहे वर्ल्ड कप हार जाओ पर पाकिस्तान  से मत हारना ।  पर जब टीम इंडिया 2003 वर्ल्ड-कप के फाईनल मे हारी तो ऐसा लगा के ये आस्ट्रेलिया से बदला लेना होगा।



India Tour Of Australia 2018

 2003 के  टीम इंडिया के  आस्ट्रेलिया दौरे की शुरुवात  मे तो ऐसा लगा नही पर फिर जब अजित अगरकर ने एक सेशन मे छ:  विकेट लिये और वीरू ने शाम को ही आधे रन बना दिये , लगा के रौंद दो इनको यही । ये वो टेस्ट मैच है जिससे हम दर्शको के दिल मे जो जगह पाकिस्तान ने ली थी , आस्ट्रेलिया उसके काफी करीब आ गया था  । MonkeyGate  ने ये जगह फिर और पक्की कर दी थी।



अब दोस्तो मे ये बाते कम होती है के पाकिस्तान कैसे उस टीम से जीता , अब तो हर वो टीम जो आस्ट्रेलिया को हरा देती है वो हमारी खास हो जाती है । चाहे वो पाकिस्तान की टीम हो । 



2003 से अब तक जो भी आस्ट्रेलिया दौरा रहा हो, दिल करता है इनको इनके घर मे हराओ । ऐसे हराओ के चाहे ये कितना भी आगे बढ जाये वो हार इनको हमेशा पीछे धकेले । 2003 मे  Adelaide Test मे राहुल द्रविड का वो आखरी रन के लिये Square Cut हो , पर्थ मे आर.पी का वो बोल्ड या भज्जी का वो पोंटिंग को आऊट करके गुलाटिया खाना हो , ये सब Golden Moments की तरह दिल मे छ्प गये है  ।



आज से टीम इंडिया का आस्ट्रेलिया दौरा शुरु हो रहा है ।  वो वीरु के 195 रन , सचिन के  Sydney Test के 200  और  इशांत शर्मा  की वो “ एक और करेगा “  वाला स्पेल  की तरह इस बार Golden Moments एक से ज्यादा हो और हम सीरिज जीत कर वापस आये ।



Bhuvneshwar Kumar Said :Sachin को out करना हमेशा याद रहेगा: भुवनेश्वर कुमार



 

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Tuesday, 4 December 2018

Best Hindi Gazal | महफिल

महफिल


महफिल मे रोज़ उनकी बात होती है,
हर शाम उनके नाम होती है,
डर खुदा से लगता है लेकिन,
फिर भी इबादत उनकी होती है,


 

महफिल मे रोज़ उनकी बात होती है
हर शाम उनके नाम होती है


गुज़रे जमाने के लोगो को कौन याद रखता है,
बात तो उनकी होती है,
जो बगावत करते है,
ज़ाम तो दर्द-ए-दिल की दवा है,---- 2
हकीमो को कौन याद रखता है
दर्द जाने के बाद,


 Best Hindi Gazal

महफिल मे रोज़ उनकी बात होती है,
हर शाम उनके नाम होती है


मौसमो को तो बदलना है ,
रुख हवा का चाहे जो भी हो,
शख्सियत हमारी वही है,
चाहे ज़ाम ही हाथ मे क्यो ना हो,


नशा ज़ाम का कुछ ऐसा,
बादलो का बारिश से है जैसा,
कलम हमारी जब चलती है,
उनकी तारीफ ही निकलती है,


शौक तो नही है ये हमारा---2
आदत अब बन गई है....


महफिल मे रोज़ उनकी बात होती है,
हर शाम उनके नाम होती है,
डर खुदा से लगता है लेकिन,
फिर भी इबादत उनकी होती है,
महफिल मे रोज़ उनकी बात होती है.


 

Chirag Ki Kalam

Gazal | Sawaal ye nahi ke vo Kaha hai


 



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Saturday, 1 December 2018

Hindi Shayari | शुक्र है शायरी है-1

शुक्रवार की इस हसीन शाम मे , मैं आपके लेकर आया हू , कुछ शायरीया जो आपके दिल को जरुर छू जायेगी ।  हर शुक्रवार

शुक्र है शायरी है

को इसी तरह से मैं आपको कुछ शायरीया सुनाता रहूंगा , उम्मीद है आप इस छोटे से शायर की शायरी को अपने दिल मे जरूर  उतारेंगे ।

आईये चलिये शुरु करते है ।

Hindi Shayari

" कदम-कदम पर गिरा हू मै,


पकड कर डोर हौसलो की चला हू मै,


इश्क भी किया मैंने तो छुप-छुप के ,


क्योंकि बेवफाई के शहर मे पला हू मै ।"



" कुछ दूर चलकर फिर रुक जाने की जिद है,
वक्त से आगे जाकर फिर उसे चिढाने की जिद है,
कश्तियो मे बैठे मुसाफिरो को किनारे पर जाने की जिद हैं,
हर तरफ बस कुछ ना कुछ पाने की जिद है,
जो कुछ देना पडे किसी गरीब को एक रुपया,
तो मुह छुपाने की जिद है.
अपनी जिंदगी मे सुकुन पाने की जिद है,
दुसरो की जिंदगी मे झाकने की जिद है,
मुस्कुराहट को गम से मिलने की जिद है
और मौत को हर जिद की हस्ती मिटाने की जिद है ।"


 

"चुप रहकर भी बहुत कुछ कहते थे,
तुम अहसासो के जरीये दिल मे रहते थे ।"



"मैं मुस्कुराता हू तो कहते है..गमो की समझ नही है..
और जब सैलाब था आंखो मे तो कहते थे...
तुम अकेले नही हो गम के सागर  मे | "


" हाथो मे चाय सुबह की,
और उसमे से उठता धुआ,
आंखो मे याद किसी की,
और होठो पर मुस्कानो का काफिला " |


 

Hindi Poetry on Life


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Saturday, 20 October 2018

Hindi Love Poem|आसान था अपना मेल प्रिये

      Hindi Love Poem on Marriage Anniversary


Hindi Poetry


 

आसान था अपना मेल प्रिये,
ये प्यार बड़ा अनमोल है प्रिये,


तू हरिद्वार का गंगा घाट है मैं हूं घाट की जंजीर प्रिये,
तू उज्जैन का पोहा है मैं हूं खट्टा मीठा जिरावान प्रिये,
तू ठण्ड के मौसम का जैकेट  है मैं हूं उस जैकेट का  टोपा प्रिये,
तू बाग़ में लगा गुलाब है और मैं गुलाब का काँटा प्रिये,
आसान था अपना मेल प्रिये,
ये प्यार बड़ा अनमोल है प्रिये,


Hindi Love Poem

तू क्रिकेट का बल्ला है मैं  हूँ लाल-सफ़ेद गेंद प्रिये,
तू इंद्रधनुष सा सतरंगी है मैं हूँ उसपर पड़ती धूप प्रिये,
तू चेहरे की मुस्कान है मैं हूं उस मुस्कान का कारण प्रिये,
तू बारिश बूंदे है और मैं हूं चातक प्रिये,


आसान था अपना मेल प्रिये,
ये प्यार बड़ा अनमोल है प्रिये,


तू राजमहल का सुन्दर दरवाजा है मैं हूं उस दरवाजे की कुण्डी प्रिये,
तू सबको जोड़ने वाला फेवीक्विक है मैं हूं उसका केप प्रिये,
तू चाँद सा सुन्दर है मैं उसपर लगा दाग प्रिये,
तू धड़कन मेरे दिल की है और मैं हूं उस धड़कन की धक् धक् प्रिये
आसान था अपना मेल प्रिये,
ये प्यार बड़ा  अनमोल है प्रिये | 


साथ ही इस कविता को मैंने अपनी Marriage Anniversary पर Zindagi Mix Veg के इवेंट मे भी सुनाया था । नीचे उसका विडियो देखिये ।



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Saturday, 6 October 2018

Gazal | Sawaal ye nahi ke vo Kaha hai

 

Read a Gazal in Hindi written by me.


gazal

सवाल ये नहीं के वो कहा है,
जवाब उनके ही साथ गुम हो गया है।
सवाल ये नहीं के वो कहा है.....


इशारो में समझ सको तो समझ जाओ तुम,
मोहब्बत में अब एहसासों की जगह कहा है।
सवाल ये नहीं के वो कहा है.....


वो गुलाब आज भी हमसे पूछता है,
जिसकी खुश्बू मुझे बनाना था वो मेरा हकदार कहा है,
सवाल ये नहीं के वो कहा है.....


मजनू हमें पूरा शहर कहता था,
चौराहे पर हो जिसका चर्चा वो इश्क अब कहा है
सवाल ये नहीं के वो कहा है.....


मैखाने में अक्सर अब जाया करता हूं,
चढ़ा दे वो नशा फिर से वो शराब कहा है ।
सवाल ये नहीं के वो कहा है.....


मंदिर,मस्जिद और गुरुद्वारे गया,
दुआ-ए-खैर में दे दे मुझे वो,वो खुदा कहा है
सवाल ये नहीं के वो कहा है.....


 

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Saturday, 15 September 2018

Memories of Ganesh Chaturthi

गणेश चतुर्थी एक ऐसा त्योहार जो समाज के हर वर्ग के लोगो को एकजुट करता है। 1893 मे जब अंग्रेजो मे राजनीतिक सभाओ पर रोक लगा दी थी तब राष्ट्रीय नेता बाल गंगाधर तिलक ने इस त्योहार की शुरुवात की जिससे दस दिन तक त्योहार के बहाने सब लोग एक जगह आकर अंग्रेजो के खिलाफ योजना बना सके ।  वैसे इस त्योहार की शुरुवात एक सामुहिक त्योहार के रुप मे हुई थी और फिर धीरे-धीरे अब एक निजी त्योहार बन गया है। अब हर चौराहे पर तो गणेश जी की स्थापना तो होती है परंतु उस दौरान आयोजित होने वाले कार्यक्रमो मे उतने लोग नही होते जो पहले आते थे। अब हर कोई अपने घर मे ही गणेशजी की पूजा कर लेता है। हालाकी आज भी देश के कई हिस्सो मे खासकर महाराष्ट्र मे इसे एक सामुहिक  उत्सव के रुप मे ही मनाया जाता है।


इस गणेश चतुर्थी मुझे अपने बचपन के दिन याद आ गये। राजा भोज की नगरी धार मे मैंने अपना काफी बचपन  गुजारा  और इस त्योहार पर तो हम खास तैय्यारी करते थे। मुझे आज भी याद है मैं “ बडे रावले “  मे रहता था।  हमारा मोहल्ला काफी बडा था इसे छोटा गाव कहे तो गलत नही होगा।  पूरे मोह्ल्ले मे दो गणेशजी की स्थापना  होती थी। हम सब दोस्त बाजार से एक रसीद कट्टा ले आते थे और उससे पहली रसीद उसी दुकानदार की काट देते थे और रसीद कट्टे के पैसे नही देने पड्ते थे।  रविवार और बाकी दिन स्कूल से आने के बाद हम लोग चंदा लेने मोह्ह्ले मे निकल जाते थे।


11, 21, 51 तो कभी कभी 101 रुपये चंदे मे पाकर हम फूले नही समाते थे। जैसा मैंने कहा के हमारा मोहह्ला काफी बडा था और इसिलिये दो गणेशजी की स्थापना होती थी तो हमारे एरिया फिक्स थे हम मोह्ह्ले के दुसरे एरिया मे चंदा लेने नही जाते थे और ना वो लोग इधर आते थे। वैसे ये सिर्फ चंदे के लिये था। बाकी हम सब दोस्त साथ ही खेला करते थे । वैसे ये दो गणेशजी की स्थापना  पहले नही होती थी । हमारे मोहह्ले मे आने का एक ही रास्ता था और गणेशजी की स्थापना गेट के उपर एक स्थान था वहा की जाती थी । अब जो लोग गेट से दूर रहते थे उन्हे वहा होने वाले कार्यक्रम देखने बाहर तक जाना पडता था साथ ही इतने लोग थे हर बच्चा कार्यक्रम मे भाग ले ये थोडा मुश्किल था। इसिलिये हम सब दोस्त जो गेट से थोडा अंदर रहते थे उन्होने ये सोचा के क्यो ना हम अंदर भी गणेशजी की स्थापना करे । हमने कुछ बडे लोगो से बात की और उन्हे हमारा ये आईडिया पसंद आया ।


हमने फिर जगह तलाशना शुरु की और फिर थोडी मशक्त के बाद मुर्ती की स्थापना “आलू वाले आंटीजी “ के घर के बाहर करने की बात पक्की हुई। आंटीजी  वैसे मेरे स्कूल के दोस्त प्रतीक के ताईजी थे परंतु उनका आलू का बिजनेस था इसिलिये सब उन्हे आलू वाले आंटीजी कहते थे।इसके साथ ही आंटीजी ” राम”  नाम लिखने की किताब भी देती थी।  सबसे चंदा इक्क्ठा करके हम लोग गणेशजी की मूर्ती बूक कर आये और चतुर्थी के दिन सब अंकल जो हमेशा राय देते थे उनसे मुहूर्त  पुछ कर चल दिये गणेशजी को लाने।  हमने तीन साल तक अंदर गणेशजी की मुर्ती की स्थापन की फिर ना जाने क्या हुआ अचानक से स्थापना होना बंद हो गई , कारण जो रहा हो मुझे लगता है ग़णेशजी शायद इतने वक्त ही वहा आना चाहते थे।


वो तीन साल मुझे हर बार इंतजार रहता था के कब गणेश चतुर्थी  आयेगी। हम लोग एक ठेला करते थे और उस पर एक साफ कपडा बिछाकर एक पटिया रखते थे और उस पर गणेशजी को  लाते थे । गुलाल उडाते हुये ढोल के साथ नाचते हुये लाते थे हम ग़णेश जी को और एक छोटा सा पांडाल बनाते जिसमे मोहह्ले के हर सदस्य का सहयोग रहता था। हम लोग गणेशजी के आसपास एक रस्सी बांध देते थे और हमारे मोहह्ले मे एक भुआजी थे वो ये ध्यान रखते थे के गाय या कोई और जानवर पांडाल के आसपास नही आये। गणेशजी के आगमन के बाद हर दिन कोई ना कोई प्रतियोगिता शाम को होती थी । रस्सी-कूद, चेयर रेस, नींबू रेस, और अंताक्षरी जैसे कई आयोजन हम करवाते थे और इसमे पूरा मोहह्ला शामिल होता था । गणेशजी का प्रसाद  पूरे मोहह्ले मे बाटना, आरती घर –घर देना ये एक अलग की मजा था जीवन का और फिर प्रसाद भी हर दिन किसी ना किसी के यहा से आ जाता था।  कभी कभी तो हमने एक वक्त मे तीन-तीन घरो से आये प्रसाद का भोग लगाया था।


Ganesh Chaturthi

10 दिन बाद जब गणेशजी के जाने का वक्त आता था तो लगता था के जैसे घर का कोई सदस्य जा रहा हो।  फिर से ठैला लाते थे और नम आखो से गणेशजी को विदा करते थे।विसर्जन करने के लिये हम लोग देवीजी के तालाब  जाते थे। विसर्जन के दिन धार मे झाकीया निकलती और रातभर घुमते घुमते हम सब दोस्त झाकीया देखते थे। हम सब दोस्तो को रमेश पहलवान की झाकी पसंद थी और सब उसकी झाकी का इंतेजार करते थे। अगले दिन छुट्टी रहती और शाम को  मैं पापा-मम्मी और प्रिया के साथ मे  झाकिया देखने जाता था। दो दिन तक उत्सव के बाद जब नजरे उस जगह जाती थी जहा गणेश जी की स्थापना की थी तो आंखे भर आती थी । कुछ दिन तक तो शाम का वक्त ही नही कटता था। ऐसा था मेरे बचपन का गणेश उत्सव , आपने भी शायद ऐसे ही मनाया हो और अगर आप आज भी ऐसे ही मना रहे तो आप काफी लकी है।


धन्यवाद ।


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Sunday, 19 August 2018

Arjun Tendulkar U19 Debut | अर्जुन से तेंडुलकर तक का सफर अभी बाकी है

मैं उस वक्त 12  साल का था और मुझे आज भी याद है। वो मेरी जिंदगी का पहला क्रिकेट वर्ल्ड-कप था। 1996 मे मैं पहली बार कोई क्रिकेट वर्ल्ड-कप देख रहा था। अगर मैं इसे अपने क्रिकेट की दुनिया की शुरुवात कहू तो गलत नही होगा। ये वर्ल्ड-कप भारत मे ही हो रहा था इसिलिये आजतक जो मैदानो के बारे मे सुना था उन्हे टीवी पर ही सही देखने का मज़ा अलग ही था। ये वर्ल्ड-कप इसलिये भी खास था क्योंकि इसमे सचिन तेंडुलकर भी खेल रहा था। मेरी तरह ये उसका भी पहला वर्ल्ड-कप था। इस वर्ल्ड-कप  के 15 साल बाद जब 2011 मे भारत ने वर्ल्ड-कप  जीता तो सचिन के संग मेरा भी सपना पूरा हुआ।

arjun_tendulkar

अब अगला वर्ल्ड-कप 2019 मे और उसके बाद 2023 मे और शायद ये वो वर्ल्ड-कप हो जब अर्जुन तेंडुलकर अपना पहला वर्ल्ड –कप  खेल ले। उस वक्त शायद कोई ना कोई बच्चा जरुर होगा जो उसी उत्साह से अपना पहला वर्ल्ड-कप  देखेगा। परंतु क्या उस वक्त फिर से वो दिल मे वही उम्मीद रख पायेगा जो मैंने 96 मे सचिन से रखी थी।

वैसे अर्जुन ने क्रिकेट  मे शुरुवात तो कर दी है। सचिन की तरह मुझे वो जादुई लेग और आफ स्पिन तो नही दिखी उसकी गेंदबाजी मे परंतु एक स्पार्क  जरुर  था ।  वैसे अर्जुन ने सचिन का एक सपना तो पूरा किया है और वो है तेज़ गेंदबाजी करने का ,सचिन शुरुवात मे एम.आर.एफ  अकेदमी गये थे। तेज़ गेंदबाज बनने पर उन्हे बैटिंग करने की ही सलाह मिली। अर्जुन वैसे जब सुबह उठ कर ग्राऊंड की तरफ जाते होंगे तो ना उन्हे जल्दी उठकर बस पकड्नी होती होगी ना सिर्फ एक वडापाव से काम चलाना पडता होगा। और अक्सर ऐसा होता है के जब सुविधाये तो फिर इंसपायर होने मे या ये कही आग लगने मे टाईम लगता है।

सदियो से भारत मे बाप के काम को बेटो ने अपना के आगे बढाया है और अर्जुन उसी राहपर है। अर्जुन के पास सचिन से सिखने को बहुत है पर वो कहते है के ना जब घर मे कोई पढाने वाला हो फिर भी बाहर ट्यूशन वाले मारसाब से ही सही समझ आता है। वैसे सचिन की एक बात  “प्ले इच बाल आन मेरिट” अर्जुन को  माननी चाहिये इससे उस पर दबाव हमेशा कम होता होगा।

अर्जुन का जन्म 24 सितबंर 1999 को हुआ और तब तक उन पर वो दबाव आ चुका  था  के वो सचिन तेंडुलकर के बेटे है। सचिन ने शायद नही कहा हो पर दुनिया के रायचंदो ने उसी दिन कह दिया था के आ गया एक ओर सचिन। मुझे लगता है ऐसा ही रायचंदो ने तब भी कहा होगा जब अभिषेक बच्चन का जन्म हुआ होगा और आगे  क्या  हुआ आप सब जानते है। आधे से ज्यादा टेलेंट तो ये रायचंदो ने खराब कर दिया है। वैसे हाल ही मे अर्जुन ने भारत की U-19 टीम के साथ डेब्यू किया था।  वहा उनका प्रदर्शन ठीक ही रहा था। पान की किसी दुकान पर बैठे एक रायचंद ने उसके बाद कहा –“  नी इसमे सचिन वाली बात नी है ,इसको कोई दुसरा धंधा  देख लेना चाहिये”।  वैसे इसी रायचंद ने इस टूर के पहले कहा था –“ कल से देख लेना दुसरा तेंडुलकर आ रिया है” । सबसे निराली बात ये है के ये मैचेस टीवी पर देखे नही । अर्जुन को ऐसे लोग बहुत मिलेंगे अब ये तो उस पर डिपेंड करता है के वो कैसे अपने करियर को आगे  ले जाता है।

U-19 टीम के कोच द्रविड के साथ अब अर्जुन किस राह पर जायेंगे  ये तो वक्त बतायेंगा परंतु ये सितारा रोहन गवास्कर ना  बने  इसकी हम दुआ  कर सकते है।

 

 

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Monday, 9 July 2018

Bhuvneshwar Kumar Said :Sachin को out करना हमेशा याद रहेगा: भुवनेश्वर कुमार



सचिन तेंडूलकर को आऊट करने का सपना तो हर गेंदबाज़ देखता हैं पर उन्हे जीरो पर आउट करने का आइडिया हर गेंदबाज के मन मे नही आता है. कुछ ही ऐसे गेंदबाज हैं जिन्होने यह अब तक यह कारनामा किया है. उन्ही मे से एक हैं भुवनेश्वर कुमार. उत्तर प्रदेश के इस मध्यम गति के स्विंग गेंदबाज़ ने 2008 के रणजी फाईनल मे सचिन को शून्य पर आउट करा था. सचिन पहली बार घरेलू क्रिकेट मे शून्य पर आऊट हुये थे.




bhuvneshwar kumar

 



  

एक बार ब्रैड हाग ने सचिन को आउट करने के बाद सचिन से गेंद पर आटोग्राफ मांगा था. सचिन ने गेंद पर लिखा दिया था” this will never happen again (ये अब कभी नही होगा) और आज तक वो फिर से सचिन का विकेट नही ले पाये हैं. क्या आपकी बात हुई उसके बाद सचिन से कभी इस बारे मे?



हर क्रिकेटर की तरह मैंने भी काफी लंबे समय से सचिन के साथ खेलने का सपना संजो रखा था. यह चाहे फिर उनके खिलाफ ही क्यो ना खेलना हो. उस मैच में सचिन आउट हो कर पवेलियन चले गए थे. मैं बाद में उनसे मिलने पहुचा था पर मुलाकात नहीं हो पाई. उसके बाद से कोई मौका ही नही आ पाया कि सचिन से बात हो पाती. और शायद आऊट होना तो किसी भी बल्लेबाज़ को अच्छा नही लगता हैं.



जब आप सचिन को गेंद करने जा रहे थे तो सीनियर खिलाड़ियों ने क्या कहा और आपके दिमाग मे क्या चल रहा था?



मैंने सिर्फ इतना सोचा था के मैं अपनी स्ट्रेंथ पर गेंद करुंगा. सीनियर खिलाडियों ने मेरा उस वक्त काफी हौसला बढाया था. इससे मुझे काफी मदद भी मिली थी.



प्रवीण कुमार आर.पी.सिंह आपके ही स्टेट यूपी से हैं. इनसे क्या सीखने को मिलता हैं?



काफी सिखने को मिलता हैं, किस तरह से आगे बढ़ना हैं. गेंदबाजी मे क्या सुधार करना हैं. इंटरनेशनल लेवल पर किस तरह से गेंदबाजी करनी चाहिये और वहां पहुचने के लिये तैयारी कैसे की जाए, ये सारी बातें हमें सीनियर प्लेयर्स ही बताते हैं.



भारत की पिचों पर तेज गेंदबाजो को मदद कम मिलती हैं और जहां तक स्विंग की बात करे तो वो भी यहां काफी मुश्किल है. इस स्थिति मे आप अपने आप को मोटिवेट कैसे करते हो?



हां कई बार होता हैं जब पिच से कोई मदद नही मिलती हैं. उस वक्त बस विकेट टू विकेट गेंदबाजी करना होता हैं और जैसा मैंने कहा के सीनियर प्लेयर्स काफी मदद करते हैं तो ऐसे मौकों पर उनकी टिप्स हमेशा काफी काम आती हैं.



आई.पी.एल मे आपने कई इंटरनेशल प्लेयर्स को बालिंग कराई थी. उन्हे गेंदबाजी करने में और घरेलू खिलाडीयो को गेंदबाजी करने में आप क्या अन्तर महसूस करते हैं. क्या ऐसा भी कोई समय आया कि आप को लगा कि इस बल्लेबाज को बाल कराना काफी मुश्किल है.  



इंटरनेशनल प्लेयर्स के पास अनुभव काफी ज्यादा होता हैं. साथ ही उन्हे गेंदबाजी करना एक अच्छी लर्निंग होती है. लेवल का डिफरेंस भी था वहां पर और जहां तक मुश्किल की बात हैं तो ऐसा कभी नहीं लगा. आप किसी भी बल्लेबाज को आउट कर सकते हो, बस आपको अच्छी गेंदबाजी करनी होती हैं. वहां पर सिर्फ आपकी गेंदबाजी मैटर करती हैं.



ईडन गार्डेन पर आपने अपना पहला घरेलू मैच खेला था. कैसा अनुभव रहा आपका वहां खेलने का.



ईडन गार्डेन पर खेलना कई भारतीय क्रिकेट खिलाड़ियों का सपना रहता हैं. मेरा भी सपना था क्यूंकि ईडन गार्डेन मेरा फैवरेट मैदान भी हैं. मैंने उस मैच मे अच्छा प्रदर्शन किया था. पहली पारी मे 3 विकेट लिये थे और इसलिये मैं इसे अपना लकी ग्राउंड मानता हूं.



जिस तरह उमेश यादव और ऐरोन के पास स्पीड है. क्या एक तेज गेंदबाज के लिये स्पीड स्विंग से ज्यादा मायने रखती हैं ?



नही ऐसा नही हैं, हर गेंदबाज का गेंदबाजी करने का स्टाईल होता हैं. उमेश और ऐरोन स्पीड से गेंदबाजी करते हैं. मेरे लिये स्विंग काफी मैटर करता है. सब कुछ इस बात पर डिपेंड करता है कि आप किस तरह से गेंदबाजी करते हैं और आपकी स्ट्रेंथ क्या है.


 

आप एक अच्छे बल्लेबाज हैं. घरेलू मैचों में आपने छ: अर्धशतक लगाये हैं. क्या आपको लगता है कि आपकी बल्लेबाजी आपके भारतीय टीम मे चयन मे मददगार रहेगी?



मै एक आलराऊंडर के तौर पर टीम मे खेलता हूं. जब आप गेंदबाजी मे अच्छा करते हो तो वो बल्लेबाजी मे फायदा मिलता हैं और जब आप बल्लेबाजी मे अच्छा करते हो तो गेंदबाजी मे आत्मविश्वास बढता हैं. अब तक के करियर मे मेरे लिये ये काफी फायदेमंद रहा हैं



आपको कब लगा कि आपको क्रिकेटर ही बनना है?

 

बचपन से शौक था क्रिकेट खेलने का, उस वक्त क्रिकेटर बनने के बारे में कभी नहीं सोचा था. फिर जब अंडर-19 मे सेलेक्शन हुआ और वहां अच्छा खेला तो लगा कि मैं क्रिकेटर बन सकता हूं.



गेंदबाजी और बल्लेबाजी मे आपका आईडियल कौन हैं?



आईडियल जैसा कुछ हैं नही पर बचपन से प्रवीण कुमार के साथ खेला हूं. हमेशा उनसे ही सिखा हैं. जब भी परेशानी आती हैं उनसे ही बात करता हूं. उनका और मेरा गेंदबाजी का अंदाज भी एक जैसा हैं.

बल्लेबाजी मे मेरा नेचुरल अंदाज हैं. कभी आईडियल नही माना किसी को, बस सचिन की बल्लेबाजी काफी पसंद आती हैं.



कितनी जल्दी अपने आप को भारतीय टीम मे देखना चाहेंगे?


 

हर कोई जो भारत मे क्रिकेट खेलता हैं वो भारतीय टीम मे खेलना चाहता हैं. जल्दी या देरी जैसी कोई बात नहीं है. बस अपना अच्छा प्रदर्शन करना हैं. बाकी चयनकर्ताओ पर निर्भर करता हैं. 



यहा तक पहुचने का श्रेय किसे देंगे?



यहां तक पहुचने का श्रेय मैं अपने माता पिता और दीदी को देना चाहता हूं. जब पहली बार स्टेडियम मे गया था तब मै काफी छोटा था. तब मेरी दीदी मुझे खेलने ले गई थी. ये ऐसा लम्हा हैं जो हमेशा मुझे याद रहेगा. साथ ही मेरे कोच विपिन और संजय रस्तोगी को भी मे इसका श्रेय देना चाहूंगा उन्होने जो भी मुझे सिखाया हैं. उसी की बदौलत यहाँ तक पहुचा हूं.



नये खिलाड़ियों के लिये आपके सुझाव.



क्रिकेट एक ऐसा खेल हैं जिसमे काफी उतार चढाव आते हैं. तो इतना कहना चाहूंगा कि आप अपना फोकस हमेशा खेल पर ही रखें और अपनी ओर से मेहनत करना बन्द न करें.



आप अपना खाली वक्त किस तरह बिताते हैं?



गाने सुनता हूऔर दोस्तों के साथ घूमता हूं.



आपका पसंदीदा सिंगर कौन हैं.



सोनू निगम के गाने मुझे काफी अच्छे लगते हैं. उनके एलबम का गाना चंदा की डोली”मुझे काफी पसंद हैं.



अब तक का यादगार पल



सचिन को आऊट करना अब तक का सबसे यादगार पल रहा हैं. उस मैच मे 5 विकेट भी लिये थे साथ मे 80 रन भी बनाये थे तो वो मैच मुझे अब तक याद हैं.




 

ये इंटरविव मैंने 2011 मे दखलंदाजी की ओर से लिया था ।

 

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Legends of Indian Cricket:Sachin Dravid Ganguly Kumble | कुछ इनसे भी सिखिये


 

“ खेलोगे कुदोगे बनोगे खराब,पढोगे लिखोगे बनोगे नवाब “ इस लाईन को मैंने बचपन मे कई बार दुरदर्शन पर एक विज्ञापन मे हमेशा सुनता था. अगर कुछ साल पिछे जाऊ तो लगभग पूरे भारत के लोग इस बात को मानते थे. फिर धीरे-धीरे स्थिती बदलती गई और एक खेल ने तो इस लाईन को पूरा ही बदल दिया.इस खेल का नाम है “क्रिकेट”. क्रिकेट की शुरुवात तो इंग्लैड मे हुई थी.परंतु अगर इसे भारत का अनौपचारिक राष्ट्रीय खेल कहा जाये तो गलत नही होगा.



1983 मे भारत ने जब कपिल देव की कप्तानी मे विश्व कप जीता तो इस देश मे क्रिकेट की एक लहर सी दौड गई. हर किसी का सपना क्रिकेटर बनने का था और इसी सपने को कही ना कही अपने दिल मे संजोकर चार ऐसे क्रिकेटर भारत के लिये खेले जिन्होने क्रिकेट जगत मे तो अपना नाम किया ही साथ ही अपनी खूबियो से हर किसी को खेल और बाकी क्षेत्रो मे आगे बढने का एक जज्बा भी दिया.



चलिये देखते है इन क्रिकेटर की उन खूबियो को जिनसे हम बहुत कुछ सिख सकते है.

असफलता से सफलता की बीच की दूरी मे सबसे पहले हमे असफल होने के डर निकालना पडता है.डर को दूर भगाना आसान नही होता है.किस तरह इस डर को दूर भगाये ये आप क्रिकेट के भगवान सचिन तेंडुलकर से सिख सकते है. 15 नवंबर 1989 को टेस्ट क्रिकेट मे डेब्यू करने वाले सचिन को चौथे टेस्ट मे वकार यूनिस की एक गेंद नाक पर लगी थी.सचिन की नाक से काफी खून निकल रहा था..दुसरे छोर पर उस वक्त नवजोत सिह सिद्धू खडे थे.इस बात का जिक्र करते हुये वो कहते है “मुझे उम्मीद नही थी के वो उठ कर वापस खेलेगा. मै दुसरे छोर पर वापस जाने लगा तभी मैंने सुना मै खेलेगा, ये शब्द सचिन के थे.” सचिन ने डर को दूर भगाया और खडे हो गये वकार यूनिस की तेज तर्रार गेंद को खेलने के लिये. उन्होने अगली ही गेंद पर एक शानदार स्ट्रेट ड्राईव लगाकर चार रन बनाये थे. उस दिन अगर सचिन अ‍गर डर कर सफलता की ओर बढते अपने कदमो वापस ले लेते तो शायद वो आज दुनिया के महान खिलाडी नही बनते.सचिन से हमे सिखना चाहिये के सफलता की मंजिल पर हमेशा निडर होकर आगे बढना चाहिये.सचिन के लिये सिर्फ एक खेल नही जीने का एक जरिया है.ये बात सचिन की इस खेल प्रति पूर्ण निष्ठा को बताती है.



जिस तरह सिक्के के दो पहले होते है ठीक उसी तरह हर बात के भी दो पहलू होते है एक सकारात्मक और दुसरा नकारात्मक. ये हम पर निर्भर करता है के हम जिंदगी मे किस पहलू को चुन कर आगे बढते है.कई बार हम असफल होने पर चीजो के अभावो की बात करते है. हमारे पास ये किताब नही थी,हम बिमार थे ऐसे कई बहाने स्टूडेंट्स कम नबंर आने पर बनाते है.परंतु अगर हम सकारात्मक सोच के साथ आगे बढे तो हमे ऐसे बहानो की जरुरत नही पडेग़ी.अभावो को कैसे सकारात्मक सोच के साथ हम अपनी ताकत मे बदल सकते है.



इसका उदाहरण भारत के पूर्व कप्तान सौरव गांगुली ने हमारे सामने पेश किया है. गांगुली कलकत्ता(अब कोलकाता) के जिस मैदान मे प्रेक्टिस करते थे वहा पर लेग साईड मे लोगो के घर की खिडकीया खुलती थी. इसी कारण उन्हे हर शाट आफ साईड मे मारने पडते थे.इसके कारण गांगुली आफ साईड मे तो काफी स्ट्रांग हो गये परंतु लेग साईड उनका थोडा कमजोर रहा. परंतु गांगुली ने अपनी लेग साईड की कमजोरी के बारे मे नही सोचा और अपनी आफ साईड की ताकत को लेकर आगे बढते रहे. अपने पहले ही दौरे पर इंग्लैड के खिलाफ गांगुली ने शानदार दो शतक लगाये.गांगुली को पूरा क्रिकेट जगत आफ साईड का भगवान कहता है.गांगुली अगर पहले ही ये सोच लेते के मै लेग साईड मे कमजोर हू तो शायद ही वो कभी इतना क्रिकेट खेल पाते.



सफलता पाने के लिये जो सबसे अहम कुंजी है वो है मेहनत.मेहनत करके आप किसी भी क्षेत्र मे सफल हो सकते हो. मेहनत से किस तरह आप अपने आप को महान बना सकते हो इसका उदाहरण देखने के लिये हमे भारतीय क्रिकेट टीम की “दिवार” रह चुके, “मिस्टर डिपेंडेबल” से सिखना होगा. सचिन,सौरव और द्रविड मे से सिर्फ द्रविड ही ऐसे खिलाडी है जिनके पास सचिन और सौरव जितना टेलेंट नही था.द्रविड ने अपनी मेहनत,लगन और धैर्य के जरिये अपने आप को इन दोनो महान खिलाडीयो के स्तर तक पहुचाया है. हम चाहे कितनी भी तरक्की कर ले पर आगे बढते रहने के लिये मेहनत हमेशा करनी होती है.इसका जीता जागता सबूत है राहुल द्रविड.शुरुवात मे द्रविड को सिर्फ टेस्ट बल्लेबाज़ माना जाता था. परंतु उन्होने अपने खेल पर मेहनत की और एकदिवसीय क्रिकेट मे नबंर 3 की पोजिशीन पर खेलते हुये भारत को कई मैचो मे जीत दिलाने मे अहम भुमिका निभाई. जब टीम को विकेट कीपर की जरुरत पडी द्रविड ने विकेटकीपिंग की,जब ओपनर की जरुरत पडी ओपनिंग की.अपने आप को हर रोल मे ढाल लेने की इस खूबी से हमे ये सिखना चाहीये के किस तरह हमे हर परिस्थिती के अनुसार अपने आप को ढाल लेना चाहीये.



अब तक हमने भारतीय क्रिकेट टीम के महान बल्लेबाजो के बारे मे बात की और देखा के उनकी खूबियो से हम काफी कुछ सिख सकते है.परंतु अगर अंत मे हम भारत के जुझारु और आखिर तक हार ना मानने वाले गेंदबाज़ के बारे मे बात ना करे तो शायद ये लेख अधुरा रह जायेगा.



मै बात कर रहा हू भारत की ओर से सबसे ज्यादा टेस्ट विकेट लेने वाले अनिल कुबंले की, जम्बो जी हा इस नाम से मशहूर इस लेग स्पिनर ने जब क्रिकेट खेलना शुरु किया तो सबने कहा के इसकी गेंद मे स्पिन काफी कम है और ये तेज़ गती से गेंद फेकता है.परंतु कुबंले इन सब बातो से परेशान नही हुये.बेशक उनकी गेंदो मे मुरली और वार्न जैसी स्पिन नही थी.पर उनकी गेंदबाजी की लाईन और लेंथ एकदम सटीक रहती थी.अनुशासन और एक्रागता का इससे अच्छा मेल शायद ही कही देखने को मिलेगा.अनिल कुबंले का आखरी दम तक मैदान मे जीत के लिये कोशिश करने का उनका जज्बा उन्हे कई खिलाडीयो से अलग करता था.वेस्टइंडीज मे जबडा टूट जाने के बाद मैदान मे आकर ब्रेन लारा का विकेट लेना हो या श्रीनाथ के साथ बेंगलौर(अब बेंगलुरु) मे 52 रन की मैच जिताऊ साझेदारी हो.कुबंले का आखिर तक हार ना मानने का जज्बा लाजवाब था.इस जज्बे से कुबंले हमेशा ये
सिखाते थे के अगर आप मन मे ठान लो तो हर मुश्किल डगर आसान हो जाती है.


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इन चारो खिलाडीयो मे जो खूबिया है उसे आप सिर्फ अपनी स्टूडेंट लाईफ मे ही नही,बल्कि जिंदगी के हर पहलू मे अपना सकते है.चारो खिलाडी की हर खूबी हमे हर कदम पर कैसे मुश्किलो से पार पाना है ये सिखाती है.वैसे तो कई ऐसे लोग है जिनसे हम सफल होने के गुर सिख सकते है. परंतु क्रिकेट एक ऐसा खेल है जो भारत मे सबसे ज्यादा देखा और खेला जाता है और ये चारो खिलाडी पिछ्ले एक दशक से भी ज्यादा वक्त से मैदान पर खेल रहे थे.जिसमे सचिन अभी भी टेस्ट क्रिकेट खेल रहे है.हमे सिर्फ इनके अच्छे प्रदर्शन पर खुश नही होना है ना ही इनके खराब प्रदर्शन पर अपना गुस्सा जाहिर करना है. हमे ये सिखना होगा के कैसे और क्यो ये इतने महान बने और हर बार अपने स्तर को बढाते ही चले गये.




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Friday, 29 June 2018

Ajinkya Rahane,The Last Warrior | द्रविड के स्कूल का आखरी स्टूडेंट



 

 रहाणे कभी उस तरह के बल्लेबाज़ नही रहे जो आते ही ताबड्तोड रन बनाने लगे। लेकिन वो हमेशा से ईनिंग को बिल्ड करते है और टीम को एक ऐसी पोजिशन मे पहुचाते है जहा से टीम के बडे हिटर स्कोर को आगे बढा सके, साथ ही अभी की जो भारत की टीम है उसमे अधिकतर स्ट्रोक प्लेयर है। रहाणे ऐसी टीम मे एक धागे की तरह है जिनके इर्द-गिर्द बाकी लोग खेल सकते है।



 


 
भारतीय क्रिकेट मे कई खिलाडी आये और गये। परंतु कुछ ही खिलाडी महान बन पाये और उनमे से एक-दो ही अपने आप मे एक स्कूल बन पाये। जी हा “स्कूल” , वो खिलाडी जिसने रिटायर्मेंट के बाद भी अपना योगदान भारत के क्रिकेट को देना जारी रखा। राहुल द्रविड एक ऐसे ही खिलाडी है। रिटायर्मेंट के बाद द्रविड अभी भारत की ए टीम के कोच है। द्रविड का योगदान एक कोच की भूमिका मे ऐसे ही रहा है जैसा महाभारत मे गुरु द्रोणाचार्य का रहा था। द्रोणाचार्य तो केवल एक ही एकलव्य से मिले थे। परंतु द्रविड के कई सारे शिष्य एकलव्य की तरह उन्हे अपना गुरु मान कर मेहनत कर रहे है। उनके सारे एकलव्य ठीक उनकी तरह तो नही है परंतु एक एकलव्य उनके काफी आसपास आ गया है। उस एकलव्य का नाम है “अजिंक्य रहाणे”। 



ajinkya rahane

 
रहाणे एक मध्यमवर्गीय महाराष्ट्रीयन परिवार मे जन्मे थे। डोम्बिवली से दक्षिण मुबंई तक रोज़ लोकल ट्रेन मे सफर करके मैदान तक पहुचते थे। शुरु से ही थोडे दुबले-पतले रहाणे साथी खिलाडियो से थोडे छोटे लगते थे। परंतु टैलेंट मे वो सबसे आगे थे। ऐसे ही एक बार दक्षिण मुबंई मे एक मैच के दौरान लगभग दस साल के रहाणे अपना पुराना सा बैट लेकर बैटिंग करने उतरे, उनके सामने एक बीस साल का नौजवान (जो बहुत तेज़ गती से गेंद फेकता था।‌) खडा था। उसने पहली गेंद फेकी और सीधा रहाणे के हेलमेट पर जाकर लगी और वो धडाम से नीचे गिर गये। सब लोग मदद के लिये दौडे, कोई पानी पिला रहा था, कोई जाने के लिये कहरहा था और रहाणे दर्द से रो रहे थे। तभी अपांयर ने आकर रहाणे से कहा –“खेलना हो तो उठो, वर्ना घर जाओ”। रहाणे उठे, अपना हेलमेट सही किया, अपने आंसू पोछे और तैय्यार हो गये खेलने के लिये। उसके बाद जो हुआ वो रहाणे आज तक करते आ रहे है। रहाणे ने उस गेंदबाज़ को 4 गेंद पर चार चौके लगाये। ऐसे ही उन्हे 2013 मे डरबन मे डेन स्टेन का एक बाऊंसर हेलमेट पर लगा था। तब भी वो घबराये नही और खेलते रहे। उन्होने उस टेस्ट मैच मे पहली पारी मे नाट-आऊट 51 और दुसरी पारी मे 96 रन बनाये थे। 



 
रहाणे ने आस्ट्रेलिया के खिलाफ टेस्ट करियर और इंग्लैड के खिलाफ वन-डे एवं टी-20 करियर का आगाज़ किया था। अपने पहले टेस्ट (मार्च 2013) मे उन्होने पहली पारी मे 7(19) और दुसरी पारी मे 1(5) रन बनाये थे। रहाणे ने अपने वन-डे करियर की शुरुवात पहले (सितबंर 2011) की थी उस पारी मे उन्होने 40(44) बनाये थे और अपने पहले टी-20(अगस्त 2011) मे 61(39) रन बनाये थे। इन दोनो पारियो मे जो खास बात थी वो यह के इन दोनो पारियो मे उन्हे अपने गुरु राहुल द्रविड के साथ खेलने का मौका मिला था। अपने पहले टी-20 मे तो रहाणे ने द्रविड के साथ मिलकर दुसरे विकेट के लिये 65 रनो की साझेदारी की थी। अब तक खेले 45 टेस्ट मैच मे उन्होने 43.17 की औसत से 2893 रन बनाये है। जिसमे 9 शतक और 12 अर्धशतक शामिल है। इन 9 शतको और 12 अर्धशतको मे से 6 शतक और 9 अर्धशतक विदेशी धरती पर आये है। उनका 43.17 का औसत भी विदेशी धरती पर 52.05 तक पहुच जाता है। ये साफ दर्शाता है के उनके पास वो तकनीक है जिससे वो भारत के बाहर सफल हो रहे है और आगे भी होंगे।



 
रहाणे कभी उस तरह के बल्लेबाज़ नही रहे जो आते ही ताबड्तोड रन बनाने लगे। लेकिन वो हमेशा से ईनिंग को बिल्ड करते है और टीम को एक ऐसी पोजिशन मे पहुचाते है जहा से टीम के बडे हिटर स्कोर को आगे बढा सके, साथ ही अभी की जो भारत की टीम है उसमे अधिकतर स्ट्रोक प्लेयर है। रहाणे ऐसी टीम मे एक धागे की तरह है जिनके इर्द-गिर्द बाकी लोग खेल सकते है। परंतु इतने काम के बल्लेबाज़ होने के बाद भी इंग्लैड के दौर पर गयी भारत की वन –डे टीम मे उन्हे जगह नही दी। कारण ये के वो बाकी बल्लेबाजो की तरह 100 गेंद खेलकर 120-130 नही बनाते और लम्बे-लम्बे छ्क्के नही लगाते। परंतु इंग्लैड मे जहा गेंद स्विंग होती है और अगला वर्ल्ड कप भी है वहा रहाणे मुश्किल परिस्थितियो मे भी अपने कलात्मक अंदाज़ से रन बना देंगे जैसा वो अब तक करते आये है। 



 
वैसे तो भारतीय टीम मे कई धुरंधर खिलाडी है। रोहित,धवन और विराट इस टीम की जान है। ये तीनो मे से अगर कोई एक भी चल निकलता है तो बाद के बल्लेबाज़ आसनी या तो टीम के स्कोर को बढा देते है या फिर रनो का पिछा करते हुये मैच जीता देते है। लेकिन हर बार ऐसा नही होता है और अगर बात इंग्लैड की पिचो की हो तो वहा गेंद स्विंग काफी होती है। इस तरह की पिचो पर शुरुवात के विकेट अक्सर जल्दी गिर जाते है और अगर आपके शुरु के तीन बल्लेबाज़ आक्रमक तरीके से खेलते है तो उनके आऊट होने के चांस और ज्यादा हो जाते है। दिसबंर 2017 मे श्रीलंका के खिलाफ एक वन-डे मे हिमाचल मे हुये मैच मे भारत की आधी टीम 30 रन से कम पर आऊट हो गई थी। उस मैच मे बस विराट नही थे और हा रहाणे भी नही थे। ऐसी पिच पर एक ऐसे बल्लेबाज़ की जरुरत थी जो पिच पर रुककर खेलना जानते हो और रहाणे इसमे माहिर है। इंग्लैड के इस दौरे पर वन-डे टीम मे अबांति रायडू को जगह दी और जैसे उनका वन-डे और स्विंग के खिलाफ रिकार्ड है उससे साफ दिखता है के उन्हे सिर्फ और सिर्फ आई.पी.एल  के प्रदर्शन के आधार पर टीम मे चुना गया है। खैर वो यो-यो टेस्ट पास नही कर पाये और टीम से बाहर कर दिये गये। लेकिन फिर भी रहाणे को  उनकी जगह टीम मे ना लेकर सुरेश रैना को ले लिया गया जिनके बारे मे सबको पता  है के वो जब गेंद स्विंग हो और बाउंसी विकेट हो तो ज्यादा रन नही बना पाते। ये इंग्लैड ही है जहा पर प्रदर्शन खराब होने के कारण पहले टीम से बाहर हो गये थे। डर सिर्फ इस बात का है अगर इस बार फिर ऐसा  हुआ  किसी मैच मे तो भारत के पास बेंच पर रहाणे नही होंगे जो टीम को अगले मैच मे बचा ले। भारत की टीम इस बार पहले टी-20 और वन-डे पहले खेल रही है ताकी टेस्ट से पहले टीम अपने आप को इंग्लैड की परिस्थितियो से अभस्त करले। परंतु इसके साथ ही आत्मविश्वास भी जरुरी है। अगर टी-20 और वन-डे मे अगर कही कुछ गडबड हुई तो टीम अपना आत्मविश्वास खो देंगी। सबसे जरुरी बात ये है के अगला वर्ल्ड कप इंग्लैड मे ही है। द्रविड के बाद रहाणे है जिन्होने क्रिकेट के मक्का “लार्ड्स” मे शतक जमाया है। भारत की टेस्ट टीम का उपकप्तान को वन-डे टीम मे जगह नही मिली ये बात आश्चर्य से कम नही है। 



 
रहाणे ने अब तक 90 मैच  मे 35.26 की औसत से 2962 रन बनाये है। जिसमे 3 शतक और 24 अर्धशतक शामिल है। रहाणे को वन-डे टीम मे शामिल ना करके शायद चयनकर्ताओ ने एक ऐसी गलती कर दी है जिसकी भरपाई करना आसान नही होगा। हम सब चाहते है के भारत की टीम इंग्लैड मे हर फार्मेट मे जीत हासिल करे और अगर ऐसा हुआ तो रहाणे की जगह चुने गये खिलाडी उस पोजिशन पर अपनी जगह स्थापित कर लेंगे और फिर रहाणे कभी रंगीन कपडो मे ना दिखेंगे।



 
देखा जाये तो रहाणे द्रविड के स्कूल के आखरी स्टूडेंट है जिनमे द्रविड की शैली की झलक देखने को मिलती है। ऐसा नही है के और खिलाडी नही आयेंगे द्रविड के स्कूल से परंतु अब जब दौर टी-20 का और 50 ओवर मे 300 रन भी मामूली लगने का हो द्रविड वाली शैली मे खेलने वाले शायद ही मिलेंगे।

 




आखिर मे हम आपको छोडे जा रहे है एक विडीयो के साथ जिसमे आप रहाणे की एक बेहतरीन वन-डे पारी को देख सकेंगे 









 



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