Poem On Unknown | वो



 
मेरे हर सफ़र का साथी था वो

 
ना जाने कब हवा चली और धुँआ हो गया वो

 

 
मेरी हर नजर का  दर्पण था वो

 
ना जाने कब धुप गई और अँधेरा हो गया वो

 

 
मेरी चादर का एक किनारा था वो

 


ना जाने कब रास्ते में काँटा आया और फट कर चिंदी हो गया वो

मेरी रात का एक सपना था वो


 
ना जाने कब सुबह हुई और टूट गया वो

 

 
Poem On Unknown

 

 
मेरी गजल का गायक था वो

 
ना जाने कब स्याही ख़त्म हुई और बेसुरा हो गया वो

 

 
मेरी आँखों में लगा सुरमा था वो

 
ना जाने कब आंसू आये और बह गया वो 

 

 
मेरी तारीफों का पुलिंदा था वो

 
ना जाने कब शोहरत गई और गुम हो गया वो 

 

 
मेरी नाजुक हथेलियों में लकीर था वो 

 
ना जाने कब बारिश हुई और मिट गया वो 

 

मेरी जिंदगी की पहचान था वो
ना जाने कब मौत आई और दफ़न हो गया वो

 
(चिराग )


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Youtube -Chirag Ki Kalam


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Comments

  1. bahut khub chirag
    is moke par m apni kuch panktiya likhti hu
    " vo to chala hi gya ,
    jise jana tha
    tu na use yaad kar
    apna jivan tu
    uske liye na barbad kar"
    _ deepti sharma

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  2. गहन अभिव्यक्ति ...........

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  3. @deepti thanks and nice lines good

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  4. पर उम्मीद में है बसा अब भी वो...
    खूबसूरत रचना।

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  5. @induravisinghji thanks a lot

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  6. अपने सुन्दर लेखन से आप ब्लॉग जगत को सदा ही
    आलोकित करते रहें यही दुआ और कामना है.

    आपसे परिचय होना वर्ष २०११ की एक सुखद उपलब्धि रही.

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  7. कल 30/01/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  8. मेरी नाजुक हथेलियों में लकीर था वो
    ना जाने कब बारिश हुई और मिट गया वो ...सजीव अभिवयक्ति.....

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