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Showing posts from 2012

Poem On City | कौन रहता है इस शहर में

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  कौन रहता हैं इस शहर में ,   अनजाने लोग जहा मिलते है अब      कौन रहता है इस शहर में,   रातो के साए जहा आते नहीं अब    बंद दरवाजे है , खिड़की पर ताले है ,   चोखट पर धुल नहीं है अब    कौन रहता है इस शहर में .....   ख्वाब तलाशने निकलना है , खुली आँखों से नींद आती नहीं अब    आसमान का रंग बदल चूका है , पानी में भी तस्वीर नहीं दिखती अब    मुस्कराहट की याददाश्त खो चुकी है , आंसुओ के सैलाब हर कदम पर है अब    कौन रहता है इस शहर में .....     विचारों की परछाई दिख रही है , राज़ बेघर हो गए है यहाँ अब    सिक्को की आवाज़ अब सुनाई देती नहीं , हवाओ में उड़ती है रोशनी उनकी अब    जिंदगी से बेवफाई सबने की है , और मौत से डरते है सब    बचपन में जवानी ,जवानी में बुढापा है , मौत के बाद भी चैन नहीं है अब   कौन रहता है इस शहर में ..... (चिराग ) Youtube Chirag Ki Kalam Also Read First Love Poem On City In Hindi | Poem On City Life | City In English | City Life In Telugu |  City Of My Dreams | Poem On City Of Gold | Poem  Marathi

Short Story On Drug | मौत के सौदागर

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मौत के सौदागर शाम ढल रही थी और ठंडी हवाए उसके चेहरे को सहला कर  उसके कान में अपना पता बता रही थी। हवाओ के आलिंगन से उसका शरीर बर्फ में बदलने को आतुर हो रहा था। उसका दिमाग बार-बार उसके कदमो को एक झोपड़ी  की ओर  जाने का इशारा कर रहा था। जहा जा कर वो ठंडी हवाओ के प्यार को बेवफाई के धुएं में उडा देगा।  जब सफ़ेद रंग का ज़हर उसके काले होठो से अन्दर की बर्फ पिघलाने के लिए जा रहा था , तब सफ़ेद ज़हर और काले होठो का संगम जिंदगी और मौत के मिलन जैसा लग रहा था।  जेब से उसने एक तस्वीर निकाली और होठो ने अंगडाई ली साथ ही आँखों के आसमान में कुछ बुँदे भी आ गई थी। उसके दिल में ख्याल आया के अब बस हुआ आज वो सबकुछ ख़त्म कर देगा और आने वाली जिंदगी सुकून से बिताएगा। अब उसके कदम तेज़ी से बढ़ रहे थे। सफ़ेद ज़हर जैसे-जैसे शरीर  में अपनी जड़े  मजबूत कर रहा था, वैसे वैसे उसके दिमाग के सारे कर्मचारी काम करने लगे थे।  जैसे ही मौके पर पहुचा सफ़ेद ज़हर का असर कम होने लगा था। उसके शरीर से पसीना आने लगा था। उसने जेब से मौत की पुडिया निकाली और एक गोली बिना पानी और दूध के खिला दी एक मौत के सौदागर को, मौत के सौदागर के शरीर से निकलते

Letter To Ex Girlfriend | बेवजह

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मैं आज फिर डाकिये को बेवजह डाट रहा था , पुचकार रहा था.सच तो ये हैं के तुने आज भी मेरे खत का जवाब नही भेजा हैं.ना जाने तू किस बात से डर रही हैं. दुनिया से ...इस दुनिया से तो बिलकुल ना डरना.ये तो पहले से ही गरीबी-अमीरी , जात-पात , सच-झूठ के दल दल मे फसी हैं.जैसे तैसे अगर इस दल-दल से निकल भी गई तो कोई बम धमाका , या बढती महंगाई और भ्रष्टाचार की रस्सी फिर धकेल देगी इन्हे इक नये और अंजाने दल-दल मे. जरुरी नही हैं के तू हा लिखे खत मे , पर ना कहने के लिये भी कोई क्या इतना इंतेज़ार करवाता हैं.कल पडोस वाली चाची बतला रही थी के कोई शहर का लडका आया था तुझे देखने के लिये , तुझे पसंद आया के नही इससे मुझे फर्क नही पडता हैं.पर तू ही सोच शहर मे कितनी तकलीफे , पैसा तो बहुत कमाते हैं शहर वाले पर फिर सैर करने तो हमारे गाव ही आते हैं.वो कन्हैया बतला रहा था के उसके घर के पास एक पक्का मकान बन रहा हैं . कोई शहर का साहब अब यहा रहना चाहता हैं. डाक्टर साहब ने उसे गाव की खुली हवा और स्वच्छ वातावरण मे रहने को कहा है. पढाई भी अच्छी होती हैं हमारे गाव मे, अपने इश्वर काका की लडकी ने अभी दसवी कक्षा मे शहर के बच्चो को भी

Poem On World | चल रही हैं दुनिया

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    धोखे पर ही चल रही हैं दुनिया, जो सच कहा मैंने तो मुझे गुनहगार कह रही हैं दुनिया   इंसान ही इंसान को जानवर कह रहा हैं, जानवरो का तो गोश्त खा रही हैं दुनिया ना अपने की फिक्र, ना पराये की खुशी, सिर्फ “ मैं ” मे सिमट गई हैं दुनिया धोखे पर ही चल रही हैं दुनिया, जो सच कहा मैंने तो मुझे गुनहगार कह रही हैं दुनिया कांच के टुकडे पर कोई चलता नही, पत्थर घरो पर एक दुसरे के फेकती हैं दुनिया मुस्कुराकर ना चलना यहा कभी, जलन के मारे जलती हैं दुनिया अच्छाई को सुंघती भी नही, बुराई से पेट भरती हैं दुनिया धोखे पर ही चल रही हैं दुनिया, जो सच कहा मैंने तो मुझे गुनहगार कह रही हैं दुनिया कोई लडे तो पिछे खडी हो जाती हैं, अकेले मे तो खुद के ही लब सील लेती हैं दुनिया कभी चादर भरोसे की ओढ मत लेना, छेद गद्दारी के करती हैं दुनिया धोखे पर ही चल रही हैं दुनिया, जो सच कहा मैंने तो मुझे गुनहगार कह रही हैं दुनिया अपनी मंज़िल का पता सबको ना बताना यहा, आंखे फोडकर सपने चुराती हैं दुनिया कभी विद्वान खुद को समझना ना यहा कदम कदम पर पाठ पढाती हैं दुनिया धोखे पर ही चल रही हैं दुनिया, जो सच कहा मैंने तो मुझे गुनहगार कह रही हैं

Hindi Short Poetry

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जरा सा रुक कर देखना कभी जरा सा रुक कर देखना कभी कब्रिस्तान मे भी , शायद कोई अभी भी जिंदगी की जंग लडता हुआ मिल जाये जरा सा रुक कर देखना कभी उस टुटे मकान मे भी , शायद अभी भी कोई सपनो के महल की दिवारे चुनते मिल जाये   जरा सा रुक कर देखना कभी  सुलझे मैदान मे भी , शायद अभी भी कोई पेड अपनी टहनियो को सहलाता हुआ मिल जाये ,   जरा सा रुक कर देखना कभी उस रात के अंधेरे मे भी , शायद अभी भी उज़ाला अपने अस्तित्व की लडाई करते हुये मिल जाये , जरा सा रुक कर देखना कभी आकाश मे भी , शायद धरती से मिलने की आस लगाये बादलो मे कोई बूंद मिल जाये. जरा सा रुक कर देखना कभी उस भिखारी के कटोरे मे भी , शायद दुआओ की कोई अधुरी कहानी मिल जाये जरा सा रुक कर देखना कभी अपने पैरो के तलवो मे भी , शायद अब तक के सफर की निशानी मिल जाये.  जरा सा रुक कर देखना कभी..... (चिराग) Hindi Short Poetry On Life | Hindi Short Poetry On Love |  Hindi  Short Poetry On Friendship | Hindi Poetry On Rain | Poetry On Mother     

Poem On Unknown | वो

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  मेरे हर सफ़र का साथी था वो   ना जाने कब हवा चली और धुँआ हो गया वो     मेरी हर नजर का  दर्पण था वो   ना जाने कब धुप गई और अँधेरा हो गया वो     मेरी चादर का एक किनारा था वो   ना जाने कब रास्ते में काँटा आया और फट कर चिंदी हो गया वो मेरी रात का एक सपना था वो   ना जाने कब सुबह हुई और टूट गया वो         मेरी गजल का गायक था वो   ना जाने कब स्याही ख़त्म हुई और बेसुरा हो गया वो     मेरी आँखों में लगा सुरमा था वो   ना जाने कब आंसू आये और बह गया वो      मेरी तारीफों का पुलिंदा था वो   ना जाने कब शोहरत गई और गुम हो गया वो      मेरी नाजुक हथेलियों में लकीर था वो    ना जाने कब बारिश हुई और मिट गया वो    मेरी जिंदगी की पहचान था वो ना जाने कब मौत आई और दफ़न हो गया वो   (चिराग ) Also Read Life Poetry Youtube - Chirag Ki Kalam Poem On Unknown | Poem On Unknown Friend | Poem On Unknown World | Poem on Unknown Citizen |  Unknown Soldier | Unknown Girl |  Unknown Author | Unknown Soldier