Sunday, 11 November 2012

Poem On City | कौन रहता है इस शहर में



 
कौन रहता हैं इस शहर में ,

 
अनजाने लोग जहा मिलते है अब 

 

 
कौन रहता है इस शहर में,

 
रातो के साए जहा आते नहीं अब 


 
बंद दरवाजे है , खिड़की पर ताले है ,

 
चोखट पर धुल नहीं है अब 

Poem On City

 
कौन रहता है इस शहर में .....


 
ख्वाब तलाशने निकलना है ,
खुली आँखों से नींद आती नहीं अब 

 
आसमान का रंग बदल चूका है ,
पानी में भी तस्वीर नहीं दिखती अब 

 

मुस्कराहट की याददाश्त खो चुकी है ,
आंसुओ के सैलाब हर कदम पर है अब 

 
कौन रहता है इस शहर में .....

 

 
विचारों की परछाई दिख रही है ,
राज़ बेघर हो गए है यहाँ अब 

 
सिक्को की आवाज़ अब सुनाई देती नहीं ,
हवाओ में उड़ती है रोशनी उनकी अब 

 
जिंदगी से बेवफाई सबने की है ,
और मौत से डरते है सब 

 
बचपन में जवानी ,जवानी में बुढापा है ,
मौत के बाद भी चैन नहीं है अब

 
कौन रहता है इस शहर में .....

(चिराग )




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Thursday, 11 October 2012

Short Story On Drug | मौत के सौदागर


मौत के सौदागर



शाम ढल रही थी और ठंडी हवाए उसके चेहरे को सहला कर  उसके कान में अपना पता बता रही थी। हवाओ के आलिंगन से उसका शरीर बर्फ में बदलने को आतुर हो रहा था। उसका दिमाग बार-बार उसके कदमो को एक झोपड़ी  की ओर  जाने का इशारा कर रहा था। जहा जा कर वो ठंडी हवाओ के प्यार को बेवफाई के धुएं में उडा देगा। 




जब सफ़ेद रंग का ज़हर उसके काले होठो से अन्दर की बर्फ पिघलाने के लिए जा रहा था , तब सफ़ेद ज़हर और काले होठो का संगम जिंदगी और मौत के मिलन जैसा लग रहा था। 


Short Story On Drug



जेब से उसने एक तस्वीर निकाली और होठो ने अंगडाई ली साथ ही आँखों के आसमान में कुछ बुँदे भी आ गई थी। उसके दिल में ख्याल आया के अब बस हुआ आज वो सबकुछ ख़त्म कर देगा और आने वाली जिंदगी सुकून से बिताएगा। अब उसके कदम तेज़ी से बढ़ रहे थे। सफ़ेद ज़हर जैसे-जैसे शरीर  में अपनी जड़े  मजबूत कर रहा था, वैसे वैसे उसके दिमाग के सारे कर्मचारी काम करने लगे थे। 




जैसे ही मौके पर पहुचा सफ़ेद ज़हर का असर कम होने लगा था। उसके शरीर से पसीना आने लगा था। उसने जेब से मौत की पुडिया निकाली और एक गोली बिना पानी और दूध के खिला दी एक मौत के सौदागर को, मौत के सौदागर के शरीर से निकलते लाल रंग में उसकी बेईमानी, हरामखोरी, चोरी  और धोखेबाजी मिल गई थी।सब मिलकर ये चिल्ला रही थी, धन्यवाद हमें आज़ाद करने के लिए। 



 

तभी वकील की आवाज़ आई " संजय बताओ कोर्ट को के कैसे और क्यों तुमने उस बदमाश का खून किया। "

संजय ज्यादा बता नहीं पाया और बस इतना कहा " अगर मैं इसे नहीं मारता तो ये मुझे और मेरे जैसे कितने की युवाओं को ड्रगस से मार देता, टीवी पर और कुछ दोस्तों के कारण में इस शमशान के दरवाजे पर पहुच गया था। मैंने अपने स्वर्ग जैसे घर पर चोरी की, माँ के गहने बेचे इस ज़हर के लिए,मेरे पास और कोई चारा नहीं था सिवाए इसका खून करने के। "

 

कोर्ट ने संजय को 5 साल के लिए बाल कारावास में भेज दिया क्योंकि उसकी उम्र सिर्फ 15 साल की थी।

 

" ऐसे कितने ही संजय ड्रगस लेने को एक स्टाईल समझ कर अपनी जिंदगी को मौत के सौदागर के हवाले कर देते है "


ये मेरी पहली कहानी हैं। एक छोटी सी कोशिश की हैं , उम्मीद करता हूँ आप सभी को पसंद आएगी। कुछ गलतिया हो तो  अवश्य बताइयेगा।

 

चिराग जोशी 


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Tuesday, 26 June 2012

Letter To Ex Girlfriend | बेवजह


मैं आज फिर डाकिये को बेवजह डाट रहा था,पुचकार रहा था.सच तो ये हैं के तुने आज भी मेरे खत का जवाब नही भेजा हैं.ना जाने तू किस बात से डर रही हैं. दुनिया से ...इस दुनिया से तो बिलकुल ना डरना.ये तो पहले से ही गरीबी-अमीरी,जात-पात,सच-झूठ के दल दल मे फसी हैं.जैसे तैसे अगर इस दल-दल से निकल भी गई तो कोई बम धमाका, या बढती महंगाई और भ्रष्टाचार की रस्सी फिर धकेल देगी इन्हे इक नये और अंजाने दल-दल मे.




जरुरी नही हैं के तू हा लिखे खत मे
,पर ना कहने के लिये भी कोई क्या इतना इंतेज़ार करवाता हैं.कल पडोस वाली चाची बतला रही थी के कोई शहर का लडका आया था तुझे देखने के लिये,तुझे पसंद आया के नही इससे मुझे फर्क नही पडता हैं.पर तू ही सोच शहर मे कितनी तकलीफे,पैसा तो बहुत कमाते हैं शहर वाले पर फिर सैर करने तो हमारे गाव ही आते हैं.वो कन्हैया बतला रहा था के उसके घर के पास एक पक्का मकान बन रहा हैं.कोई शहर का साहब अब यहा रहना चाहता हैं. डाक्टर साहब ने उसे गाव की खुली हवा और स्वच्छ वातावरण मे रहने को कहा है.



Letter To Ex Girlfriend


पढाई भी अच्छी होती हैं हमारे गाव मे,अपने इश्वर काका की लडकी ने अभी दसवी कक्षा मे शहर के बच्चो को भी पछाड दिया हैं.मैं भी तो यही पढा हू और फिर शहर जाकर कालेज की पढ़ाई पूरी करके वापस अपने गाव आया हू और अपनी खेती मे अपनी पढाई से कमाये ज्ञान को लगा रहा हू.एक वक्त पर मेरे खेत की ज़मीन बंजर कहलाती थी और आज अपने गाव की सबसे उपजाऊ जमीन हैं.



मेरे दोस्त मुझसे मजाक कर रहे थे “के कही तुझे डाकीये के साथ इश्क ना हो गया हो “ मैंने उन्हे चार थप्पड लगाये और तोड दी दोस्ती, अब तो सिर्फ मौत से दोस्ती करना बाकी हैं.मॉ भी कह रही थी के आजकल मैं कमजोर हो गया हू,वैसे तो हर मॉ को अपना बेटा कमजोर दिखाई देता हैं,परंतु इस बार सच मे दुबला हो गया हू.अब मॉ को कैसे समझाऊ के इश्क मे ना भुख लगती हैं ना प्यास.


ये एक और खत लिख रहा हू तेरे नाम इसका ज़वाब जरुर देना,वर्ना मैं फिर डाकिये को डाटूंगा,मारुंगा और पुचकारुंगा बेवजह.



                         (चिराग)


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Monday, 28 May 2012

Poem On World | चल रही हैं दुनिया



 


 


धोखे पर ही चल रही हैं दुनिया,
जो सच कहा मैंने तो मुझे गुनहगार कह रही हैं दुनिया

 
इंसान ही इंसान को जानवर कह रहा हैं,
जानवरो का तो गोश्त खा रही हैं दुनिया

ना अपने की फिक्र,
ना पराये की खुशी,
सिर्फ “ मैं ” मे सिमट गई हैं दुनिया

धोखे पर ही चल रही हैं दुनिया,
जो सच कहा मैंने तो मुझे गुनहगार कह रही हैं दुनिया

कांच के टुकडे पर कोई चलता नही,
पत्थर घरो पर एक दुसरे के फेकती हैं दुनिया

मुस्कुराकर ना चलना यहा कभी,
जलन के मारे जलती हैं दुनिया

अच्छाई को सुंघती भी नही,
बुराई से पेट भरती हैं दुनिया

धोखे पर ही चल रही हैं दुनिया,
जो सच कहा मैंने तो मुझे गुनहगार कह रही हैं दुनिया

Poem On World

कोई लडे तो पिछे खडी हो जाती हैं,
अकेले मे तो खुद के ही लब सील लेती हैं दुनिया

कभी चादर भरोसे की ओढ मत लेना,
छेद गद्दारी के करती हैं दुनिया

धोखे पर ही चल रही हैं दुनिया,
जो सच कहा मैंने तो मुझे गुनहगार कह रही हैं दुनिया

अपनी मंज़िल का पता सबको ना बताना यहा,
आंखे फोडकर सपने चुराती हैं दुनिया

कभी विद्वान खुद को समझना ना यहा
कदम कदम पर पाठ पढाती हैं दुनिया

धोखे पर ही चल रही हैं दुनिया,
जो सच कहा मैंने तो मुझे गुनहगार कह रही हैं दुनिया
(चिराग)



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Friday, 2 March 2012

Hindi Short Poetry



जरा सा रुक कर देखना कभी


जरा सा रुक कर देखना कभी कब्रिस्तान मे भी,
शायद कोई अभी भी जिंदगी की जंग लडता हुआ मिल जाये
जरा सा रुक कर देखना कभी उस टुटे मकान मे भी,
शायद अभी भी कोई सपनो के महल की दिवारे चुनते मिल जाये



 

जरा सा रुक कर देखना कभी  सुलझे मैदान मे भी
,
शायद अभी भी कोई पेड अपनी टहनियो को सहलाता हुआ मिल जाये
,
 



जरा सा रुक कर देखना कभी उस रात के अंधेरे मे भी,
शायद अभी भी उज़ाला अपने अस्तित्व की लडाई करते हुये मिल जाये,




Hindi Short Poetry

जरा सा रुक कर देखना कभी आकाश मे भी,
शायद धरती से मिलने की आस लगाये बादलो मे कोई बूंद मिल जाये.

जरा सा रुक कर देखना कभी उस भिखारी के कटोरे मे भी,
शायद दुआओ की कोई अधुरी कहानी मिल जाये

जरा सा रुक कर देखना कभी अपने पैरो के तलवो मे भी,
शायद अब तक के सफर की निशानी मिल जाये. 

जरा सा रुक कर देखना कभी.....

(चिराग)






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Tuesday, 3 January 2012

Poem On Unknown | वो



 
मेरे हर सफ़र का साथी था वो

 
ना जाने कब हवा चली और धुँआ हो गया वो

 

 
मेरी हर नजर का  दर्पण था वो

 
ना जाने कब धुप गई और अँधेरा हो गया वो

 

 
मेरी चादर का एक किनारा था वो

 


ना जाने कब रास्ते में काँटा आया और फट कर चिंदी हो गया वो

मेरी रात का एक सपना था वो


 
ना जाने कब सुबह हुई और टूट गया वो

 

 
Poem On Unknown

 

 
मेरी गजल का गायक था वो

 
ना जाने कब स्याही ख़त्म हुई और बेसुरा हो गया वो

 

 
मेरी आँखों में लगा सुरमा था वो

 
ना जाने कब आंसू आये और बह गया वो 

 

 
मेरी तारीफों का पुलिंदा था वो

 
ना जाने कब शोहरत गई और गुम हो गया वो 

 

 
मेरी नाजुक हथेलियों में लकीर था वो 

 
ना जाने कब बारिश हुई और मिट गया वो 

 

मेरी जिंदगी की पहचान था वो
ना जाने कब मौत आई और दफ़न हो गया वो

 
(चिराग )


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