Friday, 29 April 2011

मेरे महबूब


वो लटे तेरे बालो की 

कुछ कहती वो निगाहे तेरी


होठ तेरे सुर्ख लाल 

करते हैं कमाल 

 

वो चुलबुला अंदाज़ 

वो मीठी सी आवाज़


जब जब देखता हूँ तेरी हसीं 

उस दिन का सबसे खुशनसीब पल होता हैं 

वो मेरे लिए


चाहता हूँ कोई ऐसी जगह हो

जहाँ बस तू और मैं रहे 



praise-love



हाथ मैं हाथ पकड़ कर चले

समंदर के पार 

चल ले एक नया अवतार 


हवाओ का करता हूँ मैं शुक्रिया 

क्योंकि जब -जब उड़ाती हैं ये तेरी जुल्फे 

तेरी खूबसूरती में चार चाँद लग जाते हैं


हसीनाये तो कई देखी मैंने

तुझसे हसीन ना देखी कही 


तारीफ़ और क्या करू तेरी अब 

बस इतना कहूँगा के 

अगर कोई पूछे मुझसे के

इश्क कैसे होता हैं 

तो बस इतना कहूँगा के

एक बार मेरे महबूब को देख लो 

समझ आ जायेगा कैसे होता हैं .  

 

 

(चिराग )


(P.S:-This poem is for a special friend)