Wednesday, 23 February 2011

मुन्नी-2

अब तक आपने पढ़ा के मुन्नी को सच्चाई पता नहीं थी  और किस तरह उसकी माँ उसे छोड़ कर चली गयी थी ....वो भी तब जब वो सिर्फ १ साल की थी .
दिन बितते  गए मुन्नी ने स्कूल जाना शुरू कर दिया था  और पढने में भी वो काफी तेज़ थी .धीरे धीरे मुन्नी ने १२वी  उतीर्ण कर  ली 
मुन्नी अब जवान हो गयी थी और खूबसूरती में वो अपनी माँ से चार कदम आगे थी ...गाव के कई लड़के उस पर मरते थे पर उसने किसी को भाव नहीं दिया सिवाए रमेश(मुन्नी का एक मात्र दोस्त ).
अब आगे पढ़ने के लिए उसे शहर  जाना था और जो शहर वो जाना चाहती थी वो था मुंबई . परन्तु मुंबई जाने के लिए उसके पास पैसे नहीं थे .यहाँ तो वो जैसे तैसे पढ़ ली थी पर अब आगे कैसे जाये .

मुन्नी का एक दोस्त भी था रमेश जो गावं के ही मछुआरे का लड़का था दोनों काफी अच्छे दोस्त थे ,जब मुन्नी ने अपनी परेशानी रमेश को बताई तो उसने कहा के वो भी उसके साथ मुंबई जायेगा वो वहा काम करके पैसे कमाएगा और मुन्नी का खर्चा भी उठाएगा.
परन्तु मुन्नी ने मना कर दिया उसने कहा मैं तुम पर बोझ    नही  बनना चाहती हूँ, तब रमेश ने कहा दोस्त कोई बोझ नही होते और मुझे भी कुछ काम करना हैं तो मैं भी कुछ काम धुंध लूँगा वहा मुझे अपनी जिंदगी इस सागर किनारे नहीं बितानी हैं.
आखिरकार रमेश की बात मुन्नी ने मान ली पर दादी की मंजूरी भी जरुरी थी.
दादी से मुन्नी ने कहा के वो मुंबई जाना चाहती हैं पढने ,पर दादी ने मना कर दिया और कहा के वहा अकेले कहा रहेगी कही कुछ हो गया तुझे तो.....मुन्नी ने कहा आप चिंता ना करो रमेश भी मेरे साथ जा रहा हैं ,हम दोनों रह लेंगे वहां .

आखिरकार मुन्नी और रमेश दोनों मुंबई रवाना हो गए .
 मुंबई पहुच तो गए दोनों परन्तु मुंबई तो सपनो का शहर हैं  ...यहाँ सपने इतने आसानी से पुरे नहीं होते.

मुन्नी और रमेश १ हफ्ते तक घर ढूदते रहे और 
आखिरकार उन्हें एक चाल में जगह मिल ही गयी .

अब चाल का जीवन बहुत अलग था ....रोज पानी लाना झगडे सुनना और भी कई तल्कीफ होती थी चाल में ,
कुछ दिनों बाद मुन्नी को भी कॉलेज में दाखिला मिल गया और रमेश को भी एक गेरेज पर काम मिल गया .....
दोनों की जिंदगी अच्छी चल रही थी ....तभी अचानक एक दिन मुन्नी की मुलाकात सचिन से हुई ....सचिन भी उसी चाल मैं रहता था और मुन्नी के कॉलेज मैं ही पढता था .
"तुम नेहा हो ना" (मुन्नी का नाम कॉलेज में नेहा था ) सचिन  ने कहा .
"हाँ पर तुम कोन मैंने पहचाना नहीं तुम्हे ...."
"मैं सचिन तुम्हरे कॉलेज में ही पढता हूँ यही चाल में रहता हूँ" .

फिर दोनों में दोस्ती हो गयी अब रोज साथ जाना और साथ आना और मुंबई साथ घुमाना करते थे...
एसा लग रहा था के प्यार के फूल दोनों के दिल मैं खिल गए हैं .
लेकिन कहते हैं ना ..के प्यार आग का दरिया हैं और डूब कर जाना हैं 
इसीलिए प्यार मुसीबत ना लाये एसा हो नहीं सकता ....
तो एसा के हुआ इसी क्या मुसीबत आई या आने वाली हैं दोनों की ज़िन्दगी में 
जानने के लिए पढिये अगला भाग